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20150912 Seattle Falls

 

बहते झरने की बौछार ने कहा

छोटी हूँ मैं पर नवजीवन हूँ लाती ।

कुछ अंश देती हूँ संसार को

और धरती पहुंच धारा हूँ बन जाती ॥

 

जीवन प्रदान दायित्व है मेरा

चंद बूंदों से सही , फिर भी हूँ बाँट रही ।

आँखें मूँद धरती की गोद में हूँ समाती

कण कण से अपने सरलता को हूँ छांट रही ॥

 

मनुष्य , फिर तुम क्यों हो थमे हुए

सक्षम हो , श्रेष्ठ जीवन है प्राप्त किया ।

अहम और स्वयं में हो क्यों फसे हुए

जब सृष्ठि ने है तुमको प्रताप दिया ॥

 

तुम भी हो समय की एक धारा

जीवन आया है , फिर लौट जायेगा ।

क्षण क्षण से अपने करो कुछ उद्धार

आने वाला हर जीवन फल जिसका पायेगा ॥

 

मैं तो धारा हूँ , नदिया बन दायित्व निभायूँगी

तुमने तो एक ही जीवन पाया है ।

आँखें खोलो , माया छोड़ो , नवजीवन करो प्रदान

मनुष्य , इस कारणवष तू यहाँ आया है ॥

 

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एक तस्वीर हूँ मैं
रंग जिसमे भरे हैं तुमने
कई हज़ारों हलके और ख्यालों भरे
देख रही हूँ यहाँ से
कब तुम रुक जाओगे एक पल
ठहर जाओ और देखो मुझको
एक नया संसार है तुमने रच दिया
मेरे हर तरफ जन्नत है
खुशियों से है भर दिया तुमने
मेरी साँसों में है ज़िन्दगी
धड़कनो में हैं रंग तुम्हारे
चाँद की हर किरण के साथ है इंतज़ार तुम्हारा
सूरज के साथ बनता है साथ हमारा
मैं देख रही हूँ तुमको
तुम्हारे दिलो दिमाग में है कहीं कहानी हमारी
आज उतार दो हर रंग मुझमे
बाहर उतर आ रही हूँ मैं
कल तक थी एक तस्वीर
अब हूँ बन गयी ज़िन्दगी तुम्हारी|

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दर्द हुआ आवाज़ों में

लहू निकला बाज़ारों में

शोर हुआ शमशानों में

एक और नाम गया किताबों में ।

 

एहसास हुआ इंसानों को

पर काटा भी इंसानों ने

बैर लगा इतिहासों को

पर लाल रंग ही था दरारों में ।

 

एक गिरा तो और उठ आये

कोई कमी नहीं हथियारों में

सूखी आँखें अब भी हैं आस लगाये

पर कोई शिकवा नही इन कतारों में ।

 

थामे जज़बाद कुछ जवानों ने

आवाज़ लगाई दीवानों ने

मैंने लफ्ज़ उतारे हैं किताबों में

तुम इंसानियत का जज़बा उतार दो इंसानों में ॥

 kanchan

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